History of Jagannath Puri Rath Yatra – रथ यात्रा का इतिहास और महत्व

Spread the love

भगबान महाप्रभु जगन्नाथ के बारे में आज से पहले कोई सरे कहानिया सुनते है, उनकी मंदिर से ले कर रथ यात्रा तक कोई कहानिया और किम्बदन्ती है। आज इसी पोस्ट में जानेंगे History of Jagannath Puri Rath Yatra के बारे संखिप्त भाषा में।

तीन रथों में से प्रत्येक को 500 से अधिक लोगों द्वारा नहीं खींचा जाएगा, ओडिशा सरकार द्वारा समर्थित बिना किसी सामूहिक मण्डली के यात्रा पर जोर देने के बाद कहा यह करोड़ो की आस्था का विषय है।

जगन्नाथ रथ यात्रा का जुलूस और सांस्कृतिक महत्व

जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा कई मायनों में शानदार है। यह हिंदू भक्तों द्वारा बहुत लंबे समय/बर्षों से किया जा रहा है। यह रथ यात्रा पुरी और ओडिशा राज्य के लिए पहचान का प्रतीक बन गई है। इसी कारन ओडिशा पुरे बिस्व पर परिचित है ।

आइए इस जुलूस की गहराई में उतरें और समझें कि यह क्यों और कैसे मनाया जाता है, जानेंगे इसके इतिहास के बारे में। लेकिन सबसे पहले जानेंगे हम इसी त्यहार को क्यों पालन करते है।

भगबान जगन्नाथ का रथ यात्रा क्यों मनाते हैं?

नाना ऋषि के नाना मत होती है उक्ति की तरह हिंदू भक्तों के बीच विभिन्न रथ यात्रा की कहानियां लोकप्रिय हैं।

उन में से सबसे प्रसिद्ध और मान्यता प्राप्त कहानियों में से एक यह है कि भगवान कृष्ण और बलराम के मामा कंस ने भाइयों को मथुरा में उनकी हत्या के लिए आमंत्रित किया था। कंस ने अक्रूर को रथ के साथ गोकुल भेजा।

भगवान कृष्ण और बलराम रथ पर बैठे थे और मथुरा की ओर जा रहे थे। सभी कृष्ण भक्त भगवान कृष्ण के प्रस्थान के इस दिन रथ यात्रा मनाते हैं।

कई भक्तों के बीच एक और कहानी है कि रथ यात्रा उत्सव द्वारका में भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के साथ जुड़ा हुआ है।

एक बार की बात है, भगवान कृष्ण की आठ पत्नियों ने माँ रोहिणी से कृष्ण और गोपी के बारे में कुछ पवित्र कथाएँ सुनने का फैसला किया। लेकिन वह कहानी नहीं बताना चाहती थी।

भगवान कृष्ण की पत्नियों के बार-बार अनुरोध के बाद, उनकी माँ कहानी बताने के लिए तैयार हो गईं, लेकिन वह चाहती थीं कि सुभद्रा दरवाजे की रखवाली करें ताकि कोई और न सुनें।

Read also-

सीतल षष्ठी 2022 क्यों और कब, कैसे मनाया जाता है

सरल हिंदी भाषा में जानिए रथ यात्रा का इतिहास और महत्व  ke bare me

जब रोहिणी की माँ कहानियाँ सुनाती हैं, तो सुभद्रा बहुत मुग्ध हो जाती हैं। इसने उसे इतना मोहित कर लिया कि उसने ध्यान ही नहीं दिया कि भगवान कृष्ण और बलराम दरवाजे पर हैं।

वह उन दोनों के बीच में खड़ी हो गई और उन्हें रोकने के उपाय के रूप में अपना हाथ अलग रखा।

उस समय संत नारद उनके यहां आए और उन्होंने तीनों भाई-बहनों को एक साथ देखा। उन्होंने प्रार्थना की और उनका आशीर्वाद मांगा। ऐसा कहा जाता है कि भगवान कृष्ण, सुभद्रा और बलराम ने पुरी के मंदिर में अनंत काल तक निवास किया और भक्तों पर आशीर्वाद दिए।

History of Jagannath Puri Rath Yatra

बिस्व प्रसिद्ध महाप्रभु का रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और उनकी बहन देवी सुभद्रा को समर्पित करती है। रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ और उनके दो भाई-बहनों की 12 वीं शताब्दी/Century के जगन्नाथ मंदिर से 2.5 किमी दूर गुंडिचा मंदिर (मउसी माँ मंदिर) तक की वार्षिक यात्रा का जश्न मनाती है।

इसी यात्रा को इसीलिए बार्षिक यात्रा कहा जाता है, क्यों की ये शाल में एक बार होती है । जगन्नाथ रथ यात्रा उत्सव भगवान जगन्नाथ उनकी बहन देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र या उनके बड़े भाई बलराम को समर्पित है।

जगन्नाथ रथ यात्रा ओडिशा राज्य की पूरी में बड़ी ही धु धाम रूप से मनाई जाती है और ये भारत के सबसे बड़े त्योहारों में से एक है।

जहाँ लाखों भक्त आते हैं और प्रसिद्ध रथ यात्रा में भाग लेते हैं साथ ही भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद लेते हैं।

भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के तीन भारी लकड़ी (लिंब पेड़ की लकड़ी) के रथों को पारंपरिक रूप से पुरी में नौ दिवसीय उत्सव के दौरान तीन किलोमीटर की दूरी पर हजारों भक्तों द्वारा रथ को खींचा जाता है।

इस शाल 1 जुलाई सुक्रबार को श्री गुंडिचा रथ यात्रा होंगी। आठ दिनों के विश्राम के बाद, अर्थात 9 जुलाई सांईबार को बहुदा यात्रा होगी । उसी दिन भगवान जगन्नाथ अपने मुख्य घर पर लौट आते है  और इसे बहुदा यात्रा के रूप में जाना जाता है।

भगवान जगन्नाथ का रथ, नंदीघोष जिसे गरुड़ध्वज, कपिलध्वज भी कहा जाता है। इसकी उच्चता लगभग 44 फीट लंबा है और इसमें 16 पहिए हैं।

उसी तरह बलभद्र के रथ को तलध्वज या लांगलध्वज कहा जाता है, और यह 43 फीट ऊंचा है और इसमें 14 पहिए हैं।

जबकि देबि सुभद्रा के रथ में 12 पहिए हैं और यह 42 फीट लंबा है।


Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *